राधा – अध्याय 2 – हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’ – अंगिका काव्य

सुता एक वृषभानु घरोॅ मेॅ,
सुन्दर परम अनूप।
चम्पकवर्णी, गोरी-गारी,
रहै मनोहर रूप॥1॥

ऐथै दुख-तकलीफा भागलै,
छैलै हर्ष अपार।
बढ़ै रुहानी गाँव घरोॅ के,
लगै गाँव गुलजार॥2॥

जकरा धरती पर ऐला सें,
छैलै खुशी तमाम।
माय-बाप सब सोची-सोची
राखै ‘राधा’ नाम॥3॥

राधा घर ऐंगन मेॅ नाची,
सबके मन लोभाय।
हुन्नें बाबा नंद ऐंगना,
कान्हा धूम मचाय॥4॥

डेगा-डेगी भागी-भागी,
नाचै गाबी गीत।
स्वर्ग धरा पर उतरी ऐलै,
लागै मन परतीत॥5॥

हिन्नें मोहन, हुन्नें राधा,
दोनों सुख के खान।
नाचै, काबै, दौड़ी-धूपी,
आँगन, घोॅर, बथान॥6॥

घूमै घर-घर जाय, दुलारी राधा रानी।
झगड़ा कखनूॅ मेल, करै सगरे मनमानी॥
बढ़लै जल्दी ढेर, सयानी लागेॅ लगलै।
माय हिया अरमान, देखी केॅ जागेॅ लगलै॥7॥

राधा के परिवार, बिहा के सगुण उचारै।
बाबा जी के बात, वहाँ पर मोॅन बिचारै॥
मन-मन सोचै माय, देखताँ कोनों लड़का।
शादी मेॅ अरमान पुरैबै बड़का-बड़का॥8॥

जहाँ चाह छै राह वहाँ पर सगरे मिलतै।
सही लगन जों पास, विघ्न-बाधा सब हिलतै॥
लोग कहै रायान नामके लड़का छेलै।
जकरा संगे ब्याह, तुरत राधा के होलै॥9॥

सजलै जखनी रूप, सजाबै सखिया सारी।
मांग भरल सिन्दूर, निहारै छै महतारी॥
रंग-बिरंगा फूल, गुँथै छै सब्भे सखिया,
पहनाबै छै माल, खुशी से चमकै अखिया॥10॥

करलक जब शृंगार छटा-छिटकाबेॅ लगलै।
कुमकुम-बिन्दी भाल, लाल चमकाबेॅ लगलै॥
पायल पीन्ही पाँव, कमर आरू करधनियाँ,
झुमका झूलै कान, बनै सुन्दर दुलहिनियाँ॥11॥

पहुँची, कंगन हाथ, अंग सब दमकै दमदम।
जूड़ा केरोॅ फूल, हमेशा गमकै गमगम॥
माथा महकै तेल गमागम जे गमकौवा।
सिनुरा चमकै मांग, चमाचम जे चमकौवा॥12॥

कामोॅ के कमानोॅ रङ् भौंह टेढ़ोॅ मेढ़ोॅ लागै,
कारोॅ-कारोॅ आरू दोनों, अखिा के कोर छै।
लाल-लाल होठवा के भीतरोॅ सें झॉकै जबेॅ,
बिजली केॅ मॉत करै, दाँतोॅ के इंजोर छै।
रूप केरोॅ जाल ओझराबै-सोझराबै मोॅन,
बोलिया मेॅ लागै जेना जादू केरॉे डोर छै।
गाल पर बाल केरोॅ लट लहराबै तबेॅ,
लागै जेना सावनोॅ के घटा घनघोर छै॥13॥

डोली बैठी साथ, चलै छै राधा रानी।
हक्कन पारै माय, बहाबै अखिया पानी॥
ककरा नैं छों ज्ञात, बिदाई बेटी केरोॅ,
माय-बाप के साथ, बहावै आँसू जेरोॅ॥14॥

काटै हर दिन-रात जहाँ पर खेली-खेली,
झलकै आजे उदास उ सब्भे गाछ-गछेली।
गैया-बछड़ लोर चुवाबै कानी-कानी,
छेड़ै पर मृदु बात, अँचरबा जानी-मानी॥15॥

पिया सग ससुराल आय राधा मुरझैली।
नैहर के हर बात तुरन्ते ही बिसरैली॥
खुला-खुला आकाश बनैने जे घर छेली,
माया के जंजाल लखि केॅ मन ओझरैली॥16॥

छोड़ी संगी साथ, राधिका मन पछतावै।
संसारी सुखभोग, रोग अहिनों नै भावै॥
लगतै कैसे रोक, होनियों होबे करतै।
होनी खातिर द्वार, समुच्चा खुल्ले रहतै॥17॥

हुन्दौ नंदोॅ के धर बढ़लै,
नटखट नन्द किशोर।
खेलै-कूदै, धूम मचाबै,
करत सगर इंजोर॥18॥

मोर पंख माथा के ऊपर,
शोभै चन्दन भाल।
हाथ मुरलिया शोभै छेलै,
उर बैजन्ती माल॥19॥

गाय चराबै जंगल-जंगल,
गाबै मंगल गान।
मोहन के कोनों कामोॅ सें,
छेलै के अनजान॥20॥

लुक्का चोरी खेलै कखनूँ,
कखनूँ छेड़ै तान।
सखिया चौंकै सुनी मुरलिया,
खीचै बरबस ध्यान॥21॥

पनघट-पनघट गोपी छेड़ै,
कहीं मचाबै रार।
कखनूँ मीठी तान सुनाबै,
चढ़ी कदम के डार॥22॥

परभरनी के पीछू-पीछू,
कंकड़ लेनें हाथ।
चुपके-चुपके डेग बढ़ावै,
त्रिभुवन केरोॅ नाथ॥23॥

कंकड़ मरी मटकी फोड़ै,
छोड़ै नैना बाण।
घायल मनमा तड़पै देखी,
मोहन के मुस्कान॥24॥

जखनी-जखनी राधा पनघट,
पानी लेली जाय।
वोही ठाँ तखनी जा छेकै,
मनमोहन मुस्काय॥25॥

मनमोहन मोहन छलिया के,
देखै राधा रूप।
दौड़ी आबै फेरू पनघट,
झरी हुवेॅ या धूप॥26॥

रूप निहारै लपकी-झपकी,
जा गाछी के ओट।
जैतें देखी दूर कन्हैया,
मन मेॅ बड़ी कचोट॥27॥

छेड़छाड़ कुछ नोंक-झोंक सब,
उपजाबै छै प्यार।
ऊ प्यारें सबके छीनै छै,
सबटा चैन-करार॥28॥

कहवित यहो सटीक उतरलै,
राधा मोहन बीच।
प्रेम-पाश में बँधलै दोनों,
ऐलै बहुत नगीच॥29॥

मोहन बजाबै मोहनी मुरली मधुर अंदाज मेॅ।
सुध-बुध भुलै, वाधा पड़ै, सखियन सभी के काज मॅे॥30॥

ऊ बाँसुरी के धुन सुनी बेताब जब संसार छै।
मोहन बिना सबके सही ई जिन्दगी बेकार छै॥31॥

जादू महाभारी रहै छैलोॅ सकल संसार पर।
राधा बनी पागल फिरै यमुना नदी काछार पर॥32॥

दिनरात मुरली तान पर मदमस्त दीखै राधिका।
गैबोॅ-बजैबोॅ, गुनगुनैबोॅ खूब सीखै राधिका॥33॥

मुरारी मोहनी मुरली बजा पागल बनाबै छै।
सुनी धुन बावली सखिया हमेशा गुनगुनाबै छै॥34॥

सखा संगें कभी माखन, कभी दहिया चुराबै छै।
कभी भटकै गली-कूची, कभी गैया चराबै छै॥35॥

करै कोनों कलाकारी कखनियो ठीक लागै छै।
कन्हैया दूर रहतें भी बड़ी नजदीक लागै छै॥36॥

भला भगवान होतै दूर कैसें भक्त भयहारी।
नचाबै लोक तीनों बाँसुरी के तान बनबारी॥37॥

लगन जकरा हृदय मेॅ लागलै बंशी बजैया के।
कहाँ जैतै हमेशा ताकतै रस्ता कन्हैया के॥38॥

बनी राधा दिवानी लोग की कहतै कहाँ चिन्ता।
मुसीबत जोंन ऐतै जान पर सहतै कहाँ चिन्ता॥39॥

राधिका के मोन चंचल जब लखै परिवार सब,
विघ्न-बाधा डाल छीनै चैन के आधार सब॥40॥

मीन जल बिन ठीक लागै राधिका के हाल छै।
द्वार, घर-आंगन सकल जंजाल आरू जाल छै॥41॥

साँप मणियर मणि बिना जीतै कहीं केना भला।
काम तर आबै न कोनों चाल, कोनों भी कला॥42॥

घोॅर लागै कैद खाना आदमी के चाल सें।
बात की करतै कखनियो इट के देबाल सें॥43॥

कुछ दिनाँ कुछ अहिनों होलै। राधा घ्ज्ञर अन्दर ही छेलै॥
मधुवन बजलै तान मुरलिया। चिहुकी उठलै तुरत गुजरिया॥44॥

राधा मन नैं रोकेॅ पारलै। मुरली धुन पेॅ सबकुछ हारलै॥
मन मेॅ बड़ी तूफान छेलै। मोर पंखोॅ पर ध्यान छेलै॥45॥

घर में राते रात निकललै। ठीक लगैनें घात निकललै॥
आगू सुन्दर सीन जूटलै। पति देवोॅ के नीन टूटलै॥46॥

बात तखनियें काफी खललै। राधा के पाछू सें चललै॥
जहाँ मोहनी मुरली बाजै। मोहन संगे राधा राजै॥47॥

सच्चा स्वर्ग वही पर छेलै। परम ब्रह्म के दर्शन भेलै॥
देवी छेली सचमुच राधा। काटै हर संकट, हर बाधा॥48॥

मोहो भंग वही क्षण भेलै। ज्ञान किरण मन मंदिर गेलै॥
खोली आँख नींद सें जागै। पति देवोॅ के माया भागै॥49॥

‘गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काको लागूँ पाँव’
पतिदेव के हाल रहै, तखनी वोही ठाँव॥50॥

अद्भुत पावन प्रेम लखि, गेलै सिर चकराय।
राधा केरोॅ राह सें, लेलक मोंन हटाय॥51॥

जंगल के रस्ता धरै, फौरन शीश नवाय।
दुनिया के सुख मोह सब, गेलै तुरत भुलाय॥52॥

जकरा राधा प्रेम सें, मन-मंदिर बैठाय।
गलवाँही डाली सदा, छेलै गीत सुनाय॥53॥

हाव मनोहर रूप पर, मोहित अब रायान।
जंगल डेरा डालि के, करै सदा गुणगान॥54॥

खोलै राधा स्वर्ग के, ताला-कुंजी द्वार।
पतिदेवोॅ के देलकै, बदली सब संसार॥55॥

पति से पिण्ड छुटै राधा के,
लीला देखोॅ भाय।
गोकुल वंशीवट, वृन्दावन
सबटा एक लखाय॥56॥

घर सें दहिया लानी-लानी,
मोहन के लग आय।
भर-भर कटनी बड़ी प्रेम सें,
राधा खूब खिलाय॥57॥

जग पालनकर्त्ता के सब्भे,
लीला परम अपार।
खाय केॅ दही मटकी पटकी,
ठानै झट तकरार॥58॥

खीचा-तानी, रास रंग सब,
हँसी-खुशी किल्लोल।
पल-पल झगड़ा, एक पल मेल,
खुलै प्रेम के पोल॥59॥

यहीं रखै छी खैतें-पीतें,
हरि केॅ माखन चोर।
आगू चली जरा देखै छी,
कंशराज के ओर॥60॥